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Thursday, 31 December 2015

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शिक्षा और शिक्षा जगत से वर्षो से जुडा हूँ

शिक्षा और शिक्षा जगत से वर्षो से जुडा हूँ| शिक्षा के विविध प्रशासनिक विभागों में कार्यरत रहने की वजह से उस तंत्र और मानव संसाधन को नजदीक से समझने के अवसर प्राप्त हुए है| केंद्र सरकार नजदीक के दिनों में शिक्षा की नई नीति की घोषणा करने वाली है, इसके पूर्व अनुभवो के निचोड़ आधीन कुछ वृतांत प्रस्तुत करता हूँ.
भारतीय सविंधान में शिक्षा राज्य अंतर्गत का विषय है ,इस वजह से भारत के तमाम राज्यों में प्रशासनिक ढांचा अलग अलग है ,इस कारण से शिक्षा सम्बंधित पाठ्यक्रम और अभ्यासक्रम अलग अलग पाया जाता है.उच्च शिक्षा का ढांचा भी भिन्न है. प्रवेश पद्धति भी अलग है ऐसे में सर्व सामान्य निति निर्धारित करना इतना आसान नहीं है.
अब जानिये रसप्रद बात शिक्षा जगत से जुड़े मानव संसाधन में अधिकांश को तंत्र के बारे में मात्र आंशिक जानकारी है.गुजरात-राजस्थान के कुछ महानुभाओ से जानकारी लेने हेतु कुछ प्रश्न पूछे तो ऐसा लगा के उनको प्रशासन की हारमाला -hierarchy की जानकारी नहीं है.शिक्षक इस जानकारी से अनभिज्ञ है की वो किसके नियंत्रण में है और उनको जो नियंत्रण में लेने का प्रयत्न कर रहे है उनकी सता मर्यादा क्या है.अगर किसी ने उनको अपनी पहुँच के बारे में भार देकर कोई बात करी तो शिक्षक उसको सताधिष समजने लगता है. छोटे मोटे कामो के लिए योग्य प्रत्युतर सक्षम सताधिश से प्राप्त नहीं होता तब सताविहीन लोग काम करने हेतु सता का उपयोग करके सम्बंधित को अपने नियंत्रण में ले लेते है.
इस परिस्थिति के निवारण के लिये सरकार को सताधिश की भूमिका और उसके नियंत्रण में आने वाले HR को वर्गीकृत करता हुआ आदेश जारी करना चाहिए | कार्यक्रम अपनी जगह परन्तु उच्च स्तर पर जमीनी हकीकत की जानकारी उपलब्ध न हो या जानकारी उपलब्ध हो तो नजर अंदाज करना प्रशासन के हित में नजर नहीं आता है.यह अभ्यास का विषय है इसलिए उचित कार्यवाही हेतु अनुरोध है.जयहिंद

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